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Guru Purnima Importance, History, Significance

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Guru Purnima

 

  • गुरुपूर्णिमा :  गुरुपूर्णिमा अर्थात् सद्गुरु के पूजन का पर्व । आत्मस्वरुप का ज्ञान पाने के अपने कर्त्तव्य की याद दिलाने वाला, मन को दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, सद्गुरु के प्रेम और ज्ञान की गंगा में बारंबार डुबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देनेवाला जो पर्व है – वही है ‘गुरु पूर्णिमा’ ।’गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है अंधकार को दूर करना। जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर हटाकर ज्ञानरूपी प्रकाश कर दे, उन्हें “गुरु” कहा जाता है ।कबीर जी ने कहा : गुरु और भगवान दोनों मेरे सामने प्रकट होते हैं। मुझे किसको प्रणाम करना चाहिए? मैं उन गुरु के सामने झुकता हुँ, जिन्होंने ने मुझे भगवान का ज्ञान दिया |

    गुरु त्रिनेत्र रहित शिव है, चार भुजाओं से रहित  विष्णु  है, चार सिरों से रहित  ब्रह्मा  है ।  वह मानव रूप में स्वयं भगवान परमात्मा है ।

    गुरु के चरणों की पूजा सभी उपासनाओं में परम  उपासना  है ।

    गुरु सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है, गुरु पालनकर्ता विष्णु है, गुरु संहारक हैं, शिव हैं। गुरु प्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च आत्मा है – मैं इस गुरु को नमस्कार करता हुँ ।

    गुरु से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है, गुरु की कृपा से बेहतर कोई लाभ नहीं है … गुरु के ध्यान और ज्ञान से बढ़कर कोई स्थिति नहीं है ।

    गुरु की पूजा सभी पूजाओं में श्रेष्ठ पूजा है ।

    गुरु के बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता।

    जब साधक पर दु:ख पड़ता है, तो वह भगवान के करीब आता है।

    मैं लगातार  गुरु के  चरणों में झुकता हुँ, और उनसे प्रार्थना करता हुँ । मेरे सद्गुरु भगवान ने मुझे जीवन जीने का सही रास्ता दिखाया है ।

    जैसे ही आप गुरु के पीछे चलते हैं, आप अज्ञान के अंधेरे से दूर, अस्तित्व के प्रकाश में चलते हैं। आप अपने जीवन की सभी समस्याओं को पीछे छोड़कर जीवन के चरम अनुभवों की ओर बढ़ते हैं।

    सच्चे गुरु को पा लेने पर आधी दुनिया को जीत लिया जा सकता है।

    गुरु वह है जो हमें सिखाते है कि जीवन क्या है और इसका अधिकतम लाभ कैसे उठाया जाए।

    उनके वचनों में, आपको ज्ञान मिलेगा, उनके चरणों में, आपको दुनिया मिल जाएगी। गुरु आपके और ईश्वर के बीच की कड़ी है।

    गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर, मैं ज्ञान और ज्ञान की अपार संपदा प्रदान करने के लिए अपने गुरु को नमन करता हुँ।

    हे गुरुदेव ! आप ही एक हैं जिन्होंने मेरे अज्ञान के अंधकार को दूर कर मेरा मार्ग प्रशस्त किया।

    मैं जहां भी हुँ, मुझमें जो कुछ भी अच्छा मौजूद है, वह आपकी वजह से है।

    गुरु परंपरा :

    व्यासपुत्र शुकदेवजी ने जनकजी से ज्ञान पाया । जनकजी ने अष्टावक्रजी से ज्ञान पाया ।

    शुकदेवजी के चरणों में गौड़पादाचार्यजी और राजा परिक्षित जी ने ज्ञान पाया ।

    गौड़पादाचार्यजी   से गोविन्दपादाचार्यजी ने ज्ञान पाया ।

    गोविन्दपादाचार्यजी से आर्धशंकराचार्यजी ने ज्ञान पाया ।

    आर्धशंकराचार्यजी से तोटकाचार्यजी, सुरेश्वराचार्यजी, पद्मपादाचार्यजी, हस्तामलकाचार्यजी ने  ज्ञान पाया ।

    तोटकाचार्यजी से श्री राघवाचार्यजी ने   ज्ञान पाया ।

    श्री राघवाचार्यजी से श्री रामानन्द स्वामी जी ने   ज्ञान पाया ।

    श्री रामानन्द स्वामी जी से संत कबीरदासजी ने   ज्ञान पाया ।

    संत कबीरदासजी से संत कमालदासजी ने   ज्ञान पाया ।

    संत  कमालदासजी  से संत दादु दीनदयालजी ने   ज्ञान पाया ।

    संत  दादु दीनदयालजी   से स्वामी निश्चलदासजी ने   ज्ञान पाया ।

    स्वामी निश्चलदासजी से   स्वामी केशवरामजी ने    ज्ञान पाया ।

    स्वामी केशवरामजी से पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी ने ज्ञान पाया ।

    पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी से संत शिरोमणी हमारे सद्गुरुदेव परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू ने ज्ञान पाया ।

    भगवान वेदव्यासजी ने श्री पराशर ऋषी से ज्ञान पाया ।

    श्री पराशर ऋषि ने महर्षि शक्ति से ज्ञान पाया ।

    महर्षि शक्तिजी ने भगवान राम के गुरु,  महर्षि  वशिष्ठजी से ज्ञान पाया ।

    महर्षि  वशिष्ठजी ने भगवान ब्रह्माजी से  ज्ञान पाया ।

    भगवान ब्रह्माजी ने भगवान नारायण से ज्ञान पाया ।

    धन्य है गुरुभक्त !

    धन्या माता पिता धन्यो, गोत्रं धन्यं कुलोदभवः।

    धन्या च वसुधा देवि, यत्र स्याद् गुरुभक्तता ।।

    जिसके अंदर गुरु भक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसके पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, जहाँ गुरुभक्त बैठते है, वह समग्र धरती धन्य है ।

    गुरुपूर्णिमा पूजन शुभ मुर्हुत :

    पंचांग के अनुसार इस बार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 13 जुलाई को प्रात: 04:00 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 14 जुलाई को 12:06 मिनट पर दोपहर में समाप्त होगी ।

    आपको बता दें कि इस दिन 12 बजकर 45 मिनट तक इंद्र योग बना रहेगा । वहीं, 11 बजकर 18 मिनट तक पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र भी है । ऐसे में दोनों ही चीजें बहुत शुभ है मांगलिक कार्यों के लिए । इस दिन किसी चीज की शुरुआत की जा सकती है । गुरुपूर्णिमा के दिन शश, रोचक, हंस और भद्र जैसे राजयोग भी बन रहे हैं ।

    गुरुकृपा का अधिकारी कौन ?

    जिस साधक का जीवन सत्य से युक्त, मान, मत्सर, ममता और ईर्ष्या से रहित होता है, जो गुरु में दृढ़ प्रीतिवाला, कार्य में दक्ष तथा निश्चल चित्त होता है, परमार्थ का जिज्ञासु होता है – ऐसा नौ-गुणों से सुसज्ज साधक शीघ्र ही गुरुकृपा का अधिकारी होकर जीवन्मुक्ति के विलक्षण आनन्द का अनुभव कर लेता है अर्थात परमात्म-साक्षात्कार कर लेता है।

    हजारों मनुष्यों में कोई विरला सिद्धि के लिए यत्न करता है और उन सिद्धों में से कोई विरला मुझे तत्व से जान पाता है।

    आत्मसाक्षात्कार को ऐसे कोई विरले महात्मा ही पाते हैं। योगसिद्धि, दिव्य दर्शन, योगियों का आकाशगमन, खेचरी, भूचरी सिद्धियाँ, भूमि में अदृश्य हो जाना, अग्नि में प्रवेश करके अग्निमय होना, लोक-लोकान्तर में जाना, छोटा होना, बड़ा होना इन अष्टसिद्धियों और नवनिधियों के धनी हनुमानजी आत्मज्ञानी श्रीरामजी के चरणों में गये, ऐसी आत्मसाक्षात्कार की सर्वोपरि महिमा है। साधना चाहे कोई कितनी भी ऊँची कर ले, भगवान राम, श्रीकृष्ण, शिव के साथ बातचीत कर ले, शिवलोक में शिवजी के गण या विष्णुलोक में जय-विजय की नाईं रहने को भी मिल जाय फिर भी साक्षात्कार के बिन यात्रा अधूरी रहती है।

    गुरु पूर्णिमा का उदेश्य:

    मनुष्य तू इतना छोटा नहीं कि रोटी, कपड़े मकान, दुकान या रूपयों में ही सारी जिंदगी पूरी कर दे। इन छूट जाने वाली असत् चीजों में ही जीवन पूरा करके अपने साथ अन्याय मत कर। तू तो उस सत्स्वरूप परमात्मा के साक्षात्कार का लक्ष्य बना। वह कोई कठिन नहीं है, बस उससे प्रीति हो जाये।

    असत् पदार्थों की और दृष्टि रहेगी तो विषमता बढ़ेगी। यह शरीर मिथ्या है, पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। धन, पद ये मिथ्या हैं, इनकी तरफ नजर रहेगी तो आपका व्यवहार समतावाला होगा। धीरे धीरे समता में स्थिति आने से आप कर्मयोगी होने में सफल हो जाओगे। ज्ञान के द्वारा सत् असत् का विवेक करके सत् का अनुसंधान करोगे और असत् की आसक्ति मिटाकर समता में खड़े रहोगे तो आपका ज्ञानयोग हो जायगा। बिना साक्षात्कार के समता कभी आ ही नहीं सकती चाहे भक्ति में प्रखर हो, योग में प्रखर हो, ज्ञान का बस भंडार हो लेकिन अगर साक्षात्कार नहीं हुआ तो वह सिद्धपुरूष नहीं साधक है। साक्षात्कार हुआ तो बस सिद्ध हो गया।

    एक उत्तम तोहफा यह है कि आप अपने दोनों हाथों की उँगलियों को आमने सामने करके मिला दें। होंठ बंद करके जीभ ऐसे रखें कि न ऊपर लगे न नीचे, बीच में रखें। फिर जीव-ब्रह्म की एकता का संकल्प करके, तत्त्वरूप से जो मौत के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता उसमें शांत हो जायें। यह अभ्यास प्रतिदिन करें, कुछ समय श्वासोच्छवास की गिनती करें जिससे मन एकाग्र होने लगेगा, शक्ति का संचय होने लगेगा। धीरे-धीरे इस अभ्यास को बढ़ाते जायेंगे तो तत्त्व में स्थिति हो जायेगी।

  • ‘हे गुरुपूर्णिमा ! हे व्यासपूर्णिमा ! तु कृपा करना…. गुरुदेव के साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये…. मैं प्रार्थना करता हूँ गुरुवर ! आपके श्रीचरणों में मेरी श्रद्धा बनी रहे, जब तक है जिन्दगी…..वह भक्त ही क्या जो तुमसे मिलने की दुआ न करे ?

    भूल प्रभु को जिंदा रहूँ कभी ये खुदा न करे ।

    हे गुरुवर !

    लगाया जो रंग भक्ति का, उसे छूटने न देना ।

    गुरु तेरी याद का दामन, कभी छूटने न देना ॥

    हर साँस में तुम और तुम्हारा नाम रहे ।

    प्रीति की यह डोरी, कभी टूटने न देना ॥

    श्रद्धा की यह डोरी, कभी टूटने न देना ।

    बढ़ते रहे कदम सदा तेरे ही इशारे पर ॥

    गुरुदेव ! तेरी कृपा का सहारा छूटने न देना।

    सच्चे बनें और तरक्की करें हम,

    नसीबा हमारी अब रूठने न देना।

    देती है धोखा और भुलाती है दुनिया,

    भक्ति को अब हमसे लुटने न देना ॥

    प्रेम का यह रंग हमें रहे सदा याद,

    दूर होकर तुमसे यह कभी घटने न देना।

    बडी़ मुश्किल से भरकर रखी है करुणा तुम्हारी….

    बडी़ मुश्किल से थामकर रखी है श्रद्धा-भक्ति तुम्हारी….

    कृपा का यह पात्र कभी फूटने न देना ॥

    लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना ।

    प्रभुप्रीति की यह डोर कभी छूटने न देना ॥

  • गुरु पूर्णिमा संदेश :

    भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १८ पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। इस दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु के श्रीचरणों में पहुँचकर संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।

    और पूनम (पूर्णिमा) तो तुम मनाते हो लेकिन गुरुपूनम तुम्हें मनाती है कि भैया! संसार में बहुत भटके, बहुत अटके और बहुत लटके। जहाँ गये वहाँ धोखा ही खाया, अपने को ही सताया। अब जरा अपने आत्मा में आराम पाओ।

    हरिहर आदिक जगत में पूज्य देव जो कोय ।

    सद्गुरु की पूजा किये सबकी पूजा होय ॥

    कितने ही कर्म करो, कितनी ही उपासनाएँ करो, कितने ही व्रत और अनुष्ठान करो, कितना ही धन इकट्ठा कर लो और् कितना ही दुनिया का राज्य भोग लो लेकिन जब तक सद्गुरु के दिल का राज्य तुम्हारे दिल तक नहीं पहुँचता, सद्गुरुओं के दिल के खजाने तुम्हारे दिल तक नही उँडेले जाते, जब तक तुम्हारा दिल सद्गुरुओं के दिल को झेलने के काबिल नहीं बनता, तब तक सब कर्म, उपासनाएँ, पूजाएँ अधुरी रह जाती हैं। देवी-देवताओं की पूजा के बाद भी कोई पूजा शेष रह जाती है किंतु सद्गुरु की पूजा के बाद कोई पूजा नहीं बचती।

    सद्गुरु अंतःकरण के अंधकार को दूर करते हैं। आत्मज्ञान के युक्तियाँ बताते हैं गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं। वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकटाते हैं। गुरु मेघ की तरह ज्ञानवर्षा करके शिष्य को ज्ञानवृष्टि में नहलाते रहते हैं। गुरु ऐसे वैद्य हैं जो भवरोग को दूर करते हैं। गुरु वे माली हैं जो जीवनरूपी वाटिका को सुरभित करते हैं। गुरु अभेद का रहस्य बताकर भेद में अभेद का दर्शन करने की कला बताते हैं। इस दुःखरुप संसार में गुरुकृपा ही एक ऐसा अमूल्य खजाना है जो मनुष्य को आवागमन के कालचक्र से मुक्ति दिलाता है।

    जीवन में संपत्ति, स्वास्थ्य, सत्ता, पिता, पुत्र, भाई, मित्र अथवा जीवनसाथी से भी ज्यादा आवश्यकता सद्गुरु की है। सद्गुरु शिष्य को नयी दिशा देते हैं, साधना का मार्ग बताते हैं और ज्ञान की प्राप्ति कराते हैं।

    सच्चे सद्गुरु शिष्य की सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत करते हैं, योग की शिक्षा देते हैं, ज्ञान की मस्ती देते हैं, भक्ति की सरिता में अवगाहन कराते हैं और कर्म में निष्कामता सिखाते हैं। इस नश्वर शरीर में अशरीरी आत्मा का ज्ञान कराकर जीते-जी मुक्ति दिलाते हैं।

    सद्गुरु जिसे मिल जाय सो ही धन्य है जन मन्य है।

    सुरसिद्ध उसको पूजते ता सम न कोऊ अन्य है॥

    अधिकारी हो गुरुदेव से उपदेश जो नर पाय है।

    भोला तरे संसार से नहीं गर्भ में फिर आय है॥

    गुरुपूनम जैसे पर्व हमें सूचित करते हैं कि हमारी बुद्धि और तर्क जहाँ तक जाते हैं उन्हें जाने दो। यदि तर्क और बुद्धि के द्वारा तुम्हें भीतर का रस महसूस न हो तो प्रेम के पुष्प के द्वारा किसी ऐसे अलख के औलिया से पास पहुँच जाओ जो तुम्हारे हृदय में छिपे हुए प्रभुरस के द्वार को पलभर में खोल दें।

    पूज्य बापूजी कई बार कहते है कि पैसा कमाने के लिए पैसा चाहिए, शांति चाहिए, प्रेम पाने के लिए प्रेम चाहिए। जब ऐसे महापुरुषों के पास हम निःस्वार्थ, निःसंदेह, तर्करहित होकर केवल प्रेम के पुष्प लेकर पहुँचते हैं, श्रद्धा के दो आँसू लेकर पहुँचते हैं तो बदले में हृदय के द्वार खुलने का अनुभव हो जाता है। जिसे केवल गुरुभक्त जान सकता है औरों को क्या पता इस बात का ?

    गुरु-नाम उच्चारण करने पर गुरुभक्त का रोम-रोम पुलकित हो उठता है चिंताएँ काफूर हो जाती हैं, जप-तप-योग से जो नही मिल पाता वह गुरु के लिए प्रेम की एक तरंग से गुरुभक्त को मिल जाता है, इसे निगुरे नहीं समझ सकते…..

    आत्मज्ञानी, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष को जिसने गुरु के रुप में स्वीकार कर लिया हो उसके सौभाग्य का क्या वर्णन किया जाय ? गुरु के बिना तो ज्ञान पाना असंभव ही है। कहते हैं :

    ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान ।

    ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान ॥

    बस, ऐसे गुरुओं में हमारी श्रद्धा हो जाय । श्रद्धावान ही ज्ञान पाता है। गीता में भी आता हैः

    श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।

    अर्थात् जितेन्द्रिय, तत्पर हुआ श्रद्धावान पुरुष ज्ञान को प्राप्त होता है।

    ऐसा कौन-सा मनुष्य है जो संयम और श्रद्धा के द्वारा भवसागर से पार न हो सके ? उसे ज्ञान की प्राप्ति न हो ? परमात्म-पद में स्थिति न हो?

    जिसकी श्रद्धा नष्ट हुई, समझो उसका सब कुछ नष्ट हो गया। इसलिए ऐसे व्यक्तियों से बचें, ऐसे वातावरण से बचें जहाँ हमारी श्र्द्धा और संयम घटने लगे। जहाँ अपने धर्म के प्रति, महापुरुषों के प्रति हमारी श्रद्धा डगमगाये ऐसे वातावरण और परिस्थितियों से अपने को बचाओ।

    साधक के लिये गुरुपूर्णिमा, व्रत और तपस्या का दिन है। उस दिन साधक को चाहिये कि उपवास करे या दूध, फल अथवा अल्पाहार ले, गुरु के द्वार जाकर गुरुदर्शन, गुरुसेवा और गुरु-सत्संग का श्रवण करे। उस दिन सद्गुरुदेव की पूजा करने से वर्षभर की पूर्णिमाओं के दिन किये हुए सत्कर्मों के पुण्यों का फल मिलता है।

    गुरु अपने शिष्य से और कुछ नही चाहते। वे तो कहते हैं:

    तू मुझे अपना उर आँगन दे दे, मैं अमृत की वर्षा कर दूँ ।

    तुम गुरु को अपना उर-आँगन दे दो। अपनी मान्यताओं और अहं को हृदय से निकालकर गुरु से चरणों में अर्पण कर दो। गुरु उसी हृदय में सत्य-स्वरूप प्रभु का रस छलका देंगे। गुरु के द्वार पर अहं लेकर जानेवाला व्यक्ति गुरु के ज्ञान को पचा नही सकता, हरि के प्रेमरस को चख नहीं सकता।

    अपने संकल्प के अनुसार गुरु को मत चलाओ लेकिन गुरु के संकल्प में अपना संकल्प मिला दो तो बेडा़ पार हो जायेगा।

    नम्र भाव से, कपटरहित हृदय से गुरु से द्वार जानेवाला कुछ-न-कुछ पाता ही है।

    तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

    उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

    ‘उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्व को भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।’                 (गीताः ४.३४)

    जो शिष्य सद्गुरु का पावन सान्निध्य पाकर आदर व श्रद्धा से सत्संग सुनता है, सत्संग-रस का पान करता है, उस शिष्य का प्रभाव अलौकिक होता है।

    ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ में भी शिष्य से गुणों के विषय में श्री वशिष्ठजी महाराज करते हैः “जिस शिष्य को गुरु के वचनों में श्रद्धा, विश्वास और सदभावना होती है उसका कल्याण अति शीघ्र होता है।”

    शिष्य को चाहिये के गुरु, इष्ट, आत्मा और मंत्र इन चारों में ऐक्य देखे। श्रद्धा रखकर दृढ़ता से आगे बढे़। संत रैदास ने भी कहा हैः

    हरि गुरु साध समान चित्त, नित आगम तत मूल।

    इन बिच अंतर जिन परौ, करवत सहन कबूल ॥

    ‘समस्त शास्त्रों का सदैव यही मूल उपदेश है कि भगवान, गुरु और संत इन तीनों का चित्त एक समान (ब्रह्मनिष्ठ) होता है। उनके बीच कभी अंतर न समझें, ऐसी दृढ़ अद्वैत दृष्टि रखें फिर चाहे आरे से इस शरीर कट जाने का दंड भी क्यों न सहन करना पडे़ ?

    शिष्य का कर्तव्य :

    अहं और मन को गुरु से चरणों में समर्पित करके, शरीर को गुरु की सेवा में लगाकर गुरुपूर्णिमा के इस शुभ पर्व पर शिष्य को एक संकल्प अवश्य करना चाहियेः ‘इन्द्रिय-विषयों के लघु सुखों में, बंधनकर्ता तुच्छ सुखों में बह जानेवाले अपने जीवन को बचाकर मैं अपनी बुद्धि को गुरुचिंतन में, ब्रह्मचिंतन में स्थिर करूँगा।’

    बुद्धि का उपयोग बुद्धिदाता को जानने के लिए ही करें। आजकल के विद्यार्थी बडे़-बडे़ प्रमाणपत्रों के पीछे पड़ते हैं लेकिन प्राचीन काल में विद्यार्थी संयम-सदाचार का व्रत-नियम पाल कर वर्षों तक गुरु के सान्निध्य में रहकर बहुमुखी विद्या उपार्जित करते थे। भगवान श्रीराम वर्षों तक गुरुवर वशिष्ठजी के आश्रम में रहे थे। वर्त्तमान का विद्यार्थी अपनी पहचान बडी़-बडी़ डिग्रियों से देता है जबकि पहले के शिष्यों में पहचान की महत्ता वह किसका शिष्य है इससे होती थी। आजकल तो संसार का कचरा खोपडी़ में भरने की आदत हो गयी है। यह कचरा ही मान्यताएँ, कृत्रिमता तथा राग-द्वेषादि बढा़ता है और अंत में ये मान्यताएँ ही दुःख में बढा़वा करती हैं। अतः साधक को चाहिये कि वह सदैव जागृत रहकर सत्पुरुषों के सत्संग एवं ज्ञानी के सान्निध्य में रहकर परम तत्त्व परमात्मा को पाने का परम पुरुषार्थ करता रहे।

    संसार आँख और कान द्वारा अंदर घुसता है। जैसा सुनोगे वैसे बनोगे तथा वैसे ही संस्कार बनेंगे। जैसा देखोगे वैसा स्वभाव बनेगा। जो साधक सदैव आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष का ही दर्शन व सत्संग-श्रवण करता है उसके हृदय में बसा हुआ महापुरुषत्व भी देर-सवेर जागृत हो जाता है।

    माता-पिता का कर्तव्य :

    अपने बच्चों में ब्रह्मज्ञान के संस्कार भरे । महारानी मदालसा ने अपने बच्चों में ब्रह्मज्ञान के संस्कार भर दिये थे। छः में से पाँच बच्चों को छोटी उम्र में ही ब्रह्मज्ञान हो गया था। ब्रह्मज्ञान हो गया था। ब्रह्मज्ञान का सत्संग काम, क्रोध, लोभ, राग, द्वेष, आसक्ति और दूसरी सब बेवकूफियाँ छुडाता है, कार्य करने की क्षमता बढाता है, बुद्धि सूक्ष्म बनाता है तथा भगवद्ज्ञान में स्थिर करता है। ज्ञानवान के शिष्य के समान अन्य कोई सुखी नहीं है और वासनाग्रस्त मनुष्य के समान अन्य कोई दुःखी नहीं है। इसलिये साधक को गुरुपूनम के दिन गुरु के द्वार जाकर, सावधानीपूर्वक सेवा करके, सत्संग का अमृतपान करके अपना भाग्य बनाना चाहिए।

    महासंकल्प :

    इस पूनम पर चातुर्मास के लिए आप अपनी क्षमता के अनुसार कोई संकल्प अवश्य करो।

    आप कर तो बहुत सकते हो आप में ईश्वर का अथाह बल छुपा है किंतु पुरानी आदत है कि ‘हमसे नही होगा, हमारे में दम नहीं है। इस विचार को त्याग दो। आप जो चाहो वह कर सकते हो। आज के दिन आप एक संकल्प को पूरा करने के लिए तत्पर हो जाओ तो प्रकृति के वक्षःस्थल में छुपा हुआ तमाम भंडार, योग्यताओं का खजाना तुम्हारे आगे खुलता जायेगा। तुम्हें अदभुत शौर्य, पौरुष और सफलताओं की प्राप्ति होगी।

    पूज्य बापूजी कहते है, तुम्हारे रुपये-पैसे, फल-फूल आदि की मुझे आवश्यकता नहीं है किंतु तुम्हारा और तुम्हारे द्वारा किसी का कल्याण होता है तो बस, मुझे दक्षिणा मिल जाती है, मेरा स्वागत हो जाता है।

    ब्रह्मवेत्ता सद्गुरुओं का स्वागत तो यही है कि उनकी आज्ञा में रहें। वे जैसा चाहते हैं उस ढंग से अपना जीवन-मरण के चक्र को तोडकर फेंक दें और मुक्ति का अनुभव कर लें।

    साधकों के लिए गुरुपूर्णिमा एक आध्यात्मिक हिसाब-किताब का दिवस है । पहले के वर्ष में सुख-दुःख में जितनी चोट लगती थी, अब उतनी नहीं लगनी चाहिए । पहले जितना समय देते थे नश्वर चीजों के लिए, उसे अब थोडा कम करके शाश्वत में शांति पायेंगे, शाश्वत का ज्ञान पायेंगे और शाश्वत “मैं” को मैं मानेंगे, इस मरनेवाले शरीर को मैं नहीं मानेंगे । दुःख आता है चला जाता है, सुख आता है चला जाता है, चिंता आती है चली जाती है, भय आता है चला जाता है लेकिन एक ऐसा तत्त्व है जो पहले था, अभी है और बाद में रहेगा, वह मैं कौन हूँ ? उस अपने ‘मैं को जाँचो यही है गुरुपूनम का संदेश है |

    हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए।

    प्रार्थना,  गुरुपूजन,  मानस पूजन :

    सभी भक्त यदि सद्गुरु को तिलक करने लग जायें, हार पहनाने लग जायें, नहलाने लग जायें, तो यह संभव नहीं हो पायेगा। लेकिन षोडशोपचार की पूजा से भी अधिक फल देने वाली मानस पूजा करने से तो भाई ! स्वयं गुरु भी नही रोक सकते। मानस पूजा का अधिकार तो सबके पास है।

    “गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर हम मन-ही-मन अपने गुरुदेव की पूजा करते हैं…. मन-ही-मन गुरुदेव को कलश भर-भरकर गंगाजल से स्नान कराते हैं…. मन-ही-मन उनके श्रीचरणों को पखारते हैं…. परब्रह्म परमात्मस्वरूप श्रीसद्गुरुदेव को वस्त्र पहनाते हैं…. सुगंधित चंदन का तिलक करते है…. सुगंधित गुलाब और मोगरे की माला पहनाते हैं…. मनभावन सात्विक प्रसाद का भोग लगाते हैं….

    मेरे गुरुदेव ! मन-ही-मन, मानसिक रूप से मैं आपको सप्ततीर्थों के जल सेस्नान करा रहा हूँ । मेरे नाथ ! स्वच्छ वस्त्रों से आपका चिन्मय वपु (चिन्मय शरीर) पोंछ रहा हूँ । शुद्ध वस्त्र पहनाकर मैं आपको मन से ही तिलककरता हूँ, स्वीकार कीजिये । मोगरा और गुलाब के पुष्पों की दो मालाएँ आपके वक्षस्थल में सुशोभित करता हूँ ।

    आपने तो हृदयकमल विकसित करके उसकी सुवास हमारे हृदय तक पहुँचायी है लेकिन हम यह पुष्पों की सुवास आपके पावन तन तक पहुँचाते हैं, वह भी मन से, इसे स्वीकार कीजिये । साष्टांगदंडवत् प्रणाम करके हमारा अहं आपके श्रीचरणों में धरते हैं ।

    हे मेरे गुरुदेव ! आज से मेरी देह, मेरा मन, मेरा जीवन मैं आपके दैवी कार्यके निमित्त पूरा नहीं तो हररोज २ घंटा, ५ घंटा अर्पण करता हूँ, आप स्वीकार करना । भक्ति, निष्ठा और अपनी अनुभूति का दान देनेवाले देव ! बिना माँगे कोहिनूर का भी कोहिनूर आत्मप्रकाश देनेवाले हे मेरे परम हितैषी ! आपकी जय-जयकार हो ।’

    मन-ही-मन धूप-दीप से गुरु की आरती करते हैं….”

    इस प्रकार हर शिष्य मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार अपने सद्गुरुदेव का पूजन करके गुरुपूर्णिमा का पावन पर्व मना सकता है। करोडों जन्मों के माता-पिता, मित्र-सम्बंधी जो न से सके, सद्गुरुदेव वह हँसते-हँसते दे डा़लते हैं।

    ‘हे गुरुपूर्णिमा ! हे व्यासपूर्णिमा ! तु कृपा करना…. गुरुदेव के साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये…. मैं प्रार्थना करता हूँ गुरुवर ! आपके श्रीचरणों में मेरी श्रद्धा बनी रहे, जब तक है जिन्दगी…..

    गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर हे गुरुदेव ! आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम…. आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें…. अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें…. ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी प्रीति हो जाय…. प्रभु करे कि प्रभु के नाते गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे…’

    इस दिन सुबह बिस्तर पर तुम प्रार्थना करना : ‘‘हे महान पूर्णिमा ! हे गुरुपूर्णिमा ! अब हम अपनी आवश्यकता की ओर चलेंगे । इस देह की सम्पूर्ण आवश्यकताएँ कभी किसीकी पूरी नहीं हुई । हुई भी तो संतुष्टि नहीं मिली । अपनी असली आवश्यकता की तरफ हम आज से कदमरख रहे हैं । ”उसी समय ध्यान करना । शरीर बिस्तर छोडे उसके पहले अपने प्रियतम को मिलना ।

    प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं। थोडा-बहुत धूप, प्राणायाम आदि करके श्रीगुरुगीता का पाठ कर लें ।

    फिर हमें ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’ मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।

    तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।

    फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।

    इस प्रकार पूजन तब तक बार-बार करते रहें जब तक आपका पूजन गुरु तक, परमात्मा तक नहीं पहुँचे । और पूजन पहुँचने का एहसास होगा, अष्टसात्त्विक भावों [ (1) स्तम्भ, (2) स्वेद, (3)  रोमांच, (4) स्वरभंग, (5) कम्प, (6) वैवण्र्य, (7)  अश्रु, (8) प्रलय ] में से कोई-न-कोईभाव भगवत्कृपा, गुरुकृपा से आपके हृदय में प्रकट होगा । इस प्रकार गुरुपूर्णिमा का फायदा लेने की प्रेरणा सत्संग में मिलती है । इसका आपको विशेषलाभ होगा, अनंत गुना लाभ होगा ।

    अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देनी चाहिए।

    गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।

    यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।

    राग-द्वेष छोडकर गुरु की गरिमा को पाने का पर्व माने गुरुपूर्णिमा तपस्या का भी द्योतक है। ग्रीष्म के तापमान से ही खट्टा आम मीठा होता है। अनाज की परिपक्वता भी सूर्य की गर्मी से होती है। ग्रीष्म की गर्मी ही वर्षा का कारण बनती है। इसप्रकार संपूर्ण सृष्टि के मूल में तपस्या निहित है। अतः साधक को भी जीवन में तितिक्षा, तपस्या को महत्व देना चाहिए। सत्य, संयम और सदाचार के तप से अपनी आंतर चेतना खिल उठती है जबकि सुख-सुविधा का भोग करनेवाला साधक अंदर से खोखला हो जाता है। व्रत-नियम से इन्द्रियाँ तपती हैं तो अंतःकरण निर्मल बनता है और मेनेजर अमन बनता है। परिस्थिति, मन तथा प्रकृति बदलती रहे फिर भी अबदल रहनेवाला अपना जो ज्योतिस्वरुप है उसे जानने के लिए तपस्या करो। जीवन मेँ से गलतियों को चुन-चुनकर निकालो, की हुई गलती को फिर से न दुहराओ। दिल में बैठे हुए दिलबर के दर्शन न करना यह बडे-में-बडी गलती है। गुरुपूर्णिमा का व्रत इसी गलती को सुधारने का व्रत है।

    गुरुदक्षिणा :

    शिष्य की श्रद्धा और गुरु की कृपा के मिलन से ही मोक्ष का द्वार खुलता है। अगर सद्गुरु को रिझाना चाहते हो तो आज के दिन-गुरुपूनम के दिन उनको दक्षिणा जरूर देनी चाहिए ।

    चातुर्मास का आरम्भ भी आज से ही होता है। इस चातुर्मास को तपस्या का समय बनाओ। पुण्याई जमा करो। आज तुम मन-ही-मन संकल्प करो। आज की पूनम से चार मास तक परमात्मा के नाम का जप-अनुष्ठान करूँगा…. प्रतिदिन त्रिबंधयुक्त 10 प्राणायाम करुँगा। “ईश्वर की ओर”, “दिव्य प्रेरणा प्रकाश” पुस्तक अवश्य पठन करुंगा । शुक्लपक्ष की सभी व कृष्णपक्ष की सावन से कार्तिक माह के मध्य तक की चार एकादशी का व्रत करूँगा…. एक समय भोजन करूँगा, रात्रि को सोने के पहले 10 मिनट ‘हरिः ॐ…’ का गुंजन करुँगा…. श्रीयोगवाशिष्ठ ग्रंथ का स्वाध्याय करूँगा…. चार पूनम को मौन रहूँगा…. अथवा महीने में दो दिन या आठ दिन मौन रहूँगा…. कार्य करते समय पहले अपने से पूछूँगा कि कार्य करनेवाला कौन है और इसका आखिरी परिणाम क्या है ? कार्य करने के बाद भी कर्त्ता-धर्त्ता सब ईश्वर ही है, सारा कार्य ईश्वर की सत्ता से ही होता है – ऐसा स्मरण करूँगा। यही संकल्प-दान आपकी दक्षिणा हो जायेगी।

  • महाभारत, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत आदि के रचयिता महापुरुष वेदव्यासजी के ज्ञान का मनुष्यमात्र लाभ ले, इसलिए व्यासपूनम को, गुरुपूनम को, आषाढ़ी पूनम को देवताओं ने वरदानों से सुसज्जित कर दिया कि जो सशिष्य सद्गुरु के द्वार जायेगा, सद्गुरु के उपदेश पर, सद्गुरु के संकेतों पर चलेगा, सद्गुरु का सान्निध्य पायेगा उसे बारह महीनों के व्रत-उपवास करने का फल इस पूनम के व्रत-उपवास मात्र से हो जायेगा ।
  • वस्तु जितनी सूक्ष्म होती है उतनी ही वह विभु (बड़ी, व्यापक) होती है और जितनी विभु होती है उतनी वह स्वतंत्र भी होती है । आपके शरीर से आपका मन ज्यादा विभु है । शरीर तो गाड़ी की गुलामी करेगा किंतु मन तो फटाक्-से घर पहुँच जायेगा, मुंबई, कोलकाता, देश परदेश पहुँच जायेगा । मन से भी ज्यादा आपकी मति वि है और मति से भी ज्यादा आपका जीव विभु है । जीव से भी ज्यादा आपका आत्मा-परमात्मा विभु है । ऐसे विभु के ज्ञान को देनेवाले जो महापुरुष हुए वे ‘व्यास’ कहे गये और उन महापुरुष का ज्ञान समाज को मिलता रहे, समाज खा-पीकर पशु की नाईं अपनी जिंदगी पसार न करे अपितु बड़ा दुर्लभ मनुष्य-शरीर, दुर्लभ चीज परमात्म-सुख पाने के लिए है – ऐसे ज्ञान की, सत्संग की जो सुंदर व्यवस्था उन महापुरुषों ने की, उसका लाभ समाज को मिलता रहे इसलिए व्यासपूर्णिमा मनायी जाती है ।
  • व्यासपूर्णिमा भारत में तो अनादि काल से मनायी जाती है तथा धरती के कई देशों – जैसे एटलांटिक सभ्यता, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, मिस्र, मेसोपोटेमिया, तिब्बत, चीन और जापान में भी मनायी तो जाती थी परंतु वहाँ परब्रह्म परमात्मा का अनुभव किये हुए, आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए व्यासजी जैसे महापुरुष नहीं हो पाये और व्यासजी के आदेशों को, व्यासजी के उद्देश्य को, व्यासजी के मार्गदर्शन को ठीक से समझनेवाला, समझकर उसके अनुसार चलनेवाला समाज भी नहीं हो पाया । केवल भारत में ही ऐसे महापुरुषों की परंपरा बनी रही और महापुरुषों से लाभ लेकर अपनी सात पीढ़ियाँ तारनेवाले सत्पुत्र, सत्पात्र भी इसी देश में बने रहे हैं, इसलिए आज भी भारत में व्यासपूर्णिमा का महोत्सव सुरक्षित है । एक-दो जगह नहीं, दस-पाँच जगह नहीं, पचीस-पचास जगह नहीं, देश भर में जहाँ-जहाँ अच्छे, उच्चकोटि के, उच्च आदर्शों के धनी, उच्च नियम और संयम के धनी, उच्च अनुभव और उच्च प्रकाश के धनी गुरु लोग हैं वहाँ यह व्यासपूर्णिमा मनायी जाती है ।
  • जब तक मानव जाति को सच्चे सुख की आवश्यकता है और सच्चे सुख का अनुभव करानेवाले गुरु जब तक धरती पर हैं, तब तक गुरुओं का आदर एवं पूजन होता ही रहेगा । गुरु का पूजन गुरु का आदर है, सत्य का, ज्ञान का आदर है; अपने जीवन का आदर है । अपनी मनुष्यता का आदर ही सद्गुरु का आदर है । जो अपने मनुष्य-जीवन का आदर नहीं जानता, वह सद्गुरु का आदर क्या जाने ? जो अपने मनुष्य जीवन का महत्त्व नहीं जानता, वह अपने सद्गुरु का महत्त्व क्या जाने ? जो अपने मनुष्य-जीवन की महानता नहीं जानता है, वह सद्गुरु की महानता क्या जाने ? सद्गुरु का ज्ञान लहराता सागर है और शिष्यरूपी चंद्र को देखकर उछलता है । निर्मल बुद्धि हो जाता है शिष्य ! निर्मल बुद्धि में कोमलता आती है । वह निर्मल बुद्धि शुद्ध हृदय में ज्ञान का जगमगाता प्रकाश, आनंद, नित्य नवीन रस प्रकट करने में सक्षम होती है ।

Importance & Significance of Guru Purnima in Hindi