Guru Purnima Importance, History, Significance in Hindi

Guru Purnima Importance, History, Significance in Hindi

 History Story of Guru Purnima in Hindi:

  • महाभारत, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत आदि के रचयिता महापुरुष वेदव्यासजी के ज्ञान का मनुष्यमात्र लाभ ले, इसलिए व्यासपूनम को, गुरुपूनम को, आषाढ़ी पूनम को देवताओं ने वरदानों से सुसज्जित कर दिया कि जो सशिष्य सद्गुरु के द्वार जायेगा, सद्गुरु के उपदेश पर, सद्गुरु के संकेतों पर चलेगा, सद्गुरु का सान्निध्य पायेगा उसे बारह महीनों के व्रत-उपवास करने का फल इस पूनम के व्रत-उपवास मात्र से हो जायेगा ।
  • वस्तु जितनी सूक्ष्म होती है उतनी ही वह विभु (बड़ी, व्यापक) होती है और जितनी विभु होती है उतनी वह स्वतंत्र भी होती है । आपके शरीर से आपका मन ज्यादा विभु है । शरीर तो गाड़ी की गुलामी करेगा किंतु मन तो फटाक्-से घर पहुँच जायेगा, मुंबई, कोलकाता, देश परदेश पहुँच जायेगा । मन से भी ज्यादा आपकी मति वि है और मति से भी ज्यादा आपका जीव विभु है । जीव से भी ज्यादा आपका आत्मा-परमात्मा विभु है । ऐसे विभु के ज्ञान को देनेवाले जो महापुरुष हुए वे ‘व्यास’ कहे गये और उन महापुरुष का ज्ञान समाज को मिलता रहे, समाज खा-पीकर पशु की नाईं अपनी जिंदगी पसार न करे अपितु बड़ा दुर्लभ मनुष्य-शरीर, दुर्लभ चीज परमात्म-सुख पाने के लिए है – ऐसे ज्ञान की, सत्संग की जो सुंदर व्यवस्था उन महापुरुषों ने की, उसका लाभ समाज को मिलता रहे इसलिए व्यासपूर्णिमा मनायी जाती है ।
  • व्यासपूर्णिमा भारत में तो अनादि काल से मनायी जाती है तथा धरती के कई देशों – जैसे एटलांटिक सभ्यता, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, मिस्र, मेसोपोटेमिया, तिब्बत, चीन और जापान में भी मनायी तो जाती थी परंतु वहाँ परब्रह्म परमात्मा का अनुभव किये हुए, आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए व्यासजी जैसे महापुरुष नहीं हो पाये और व्यासजी के आदेशों को, व्यासजी के उद्देश्य को, व्यासजी के मार्गदर्शन को ठीक से समझनेवाला, समझकर उसके अनुसार चलनेवाला समाज भी नहीं हो पाया । केवल भारत में ही ऐसे महापुरुषों की परंपरा बनी रही और महापुरुषों से लाभ लेकर अपनी सात पीढ़ियाँ तारनेवाले सत्पुत्र, सत्पात्र भी इसी देश में बने रहे हैं, इसलिए आज भी भारत में व्यासपूर्णिमा का महोत्सव सुरक्षित है । एक-दो जगह नहीं, दस-पाँच जगह नहीं, पचीस-पचास जगह नहीं, देश भर में जहाँ-जहाँ अच्छे, उच्चकोटि के, उच्च आदर्शों के धनी, उच्च नियम और संयम के धनी, उच्च अनुभव और उच्च प्रकाश के धनी गुरु लोग हैं वहाँ यह व्यासपूर्णिमा मनायी जाती है ।
  • जब तक मानव जाति को सच्चे सुख की आवश्यकता है और सच्चे सुख का अनुभव करानेवाले गुरु जब तक धरती पर हैं, तब तक गुरुओं का आदर एवं पूजन होता ही रहेगा । गुरु का पूजन गुरु का आदर है, सत्य का, ज्ञान का आदर है; अपने जीवन का आदर है । अपनी मनुष्यता का आदर ही सद्गुरु का आदर है । जो अपने मनुष्य-जीवन का आदर नहीं जानता, वह सद्गुरु का आदर क्या जाने ? जो अपने मनुष्य जीवन का महत्त्व नहीं जानता, वह अपने सद्गुरु का महत्त्व क्या जाने ? जो अपने मनुष्य-जीवन की महानता नहीं जानता है, वह सद्गुरु की महानता क्या जाने ? सद्गुरु का ज्ञान लहराता सागर है और शिष्यरूपी चंद्र को देखकर उछलता है । निर्मल बुद्धि हो जाता है शिष्य ! निर्मल बुद्धि में कोमलता आती है । वह निर्मल बुद्धि शुद्ध हृदय में ज्ञान का जगमगाता प्रकाश, आनंद, नित्य नवीन रस प्रकट करने में सक्षम होती है ।

Importance & Significance of Guru Purnima in Hindi