श्री योगवासिष्ठ महारामायण

श्री योगवासिष्ठ महारामायण (आश्रम) वैराग्य प्रकरण, मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण,उत्पत्ति प्रकरण   भाग - १ -  PDF-1 स्थिति प्रकरण, उपशम प्रकरण भाग – २ - PDF-2 निर्वाण प्रकरण भाग – ३ - PDF-3 भाग – ४ - PDF-4

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श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ७

योग वशिष्ठ महारामायण : जो मनुष्य लेता है. देता है और सारे कार्य करता है, पर जिसके चित को अनात्म-अभिमान स्पर्श नहीं करता है उसको समाहित चित कहते हैं । बापूजी : लेता-देता, खाता-पिता सब व्यवहार करता है, लेकिन अविद्या वाली, अनात्म वाली वस्तु जिसके चित में सत बुद्धि नहीं करती वो…

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श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ६

योग वशिष्ठ महारामायण : भुशुण्डी जी बोले हे मुनीश्वर, केवल एक आत्म दृष्टि ही सबसे श्रेष्ठ है, जिसे पाने से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं और परम पद प्राप्त होता है । बापूजी : आत्म दृष्टि से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं । जगत की दृष्टि रखो तो कितनी भी…

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श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ५

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जो कोई उनके निकट आता है वह भी शीतल हो जाता है क्योंकि वे सदा निरावरण स्तिथ होते हैं | ज्ञानवान सबका आश्रय दाता है | बापूजी : देखो जी अभी सुना था कि पाशवी अंश, मानवी अंश और ईश्वरीय अंश तीन अंशों का घटक हमारा…

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